Friday, September 16, 2016

सीपीआईएम की आंखों पर हिंदुत्व का परदा?

`लग्गी जे तेरे कालज़े हाल्ले छुरी नहीं
एह ना समझ शहर दी हालत बुरी नहीं`
(सुरजीत पात्तर की पंक्तियां)

 


`देश में अभी जो राजनीतिक हालात हैं, उसमें यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।` 

- प्रकाश करात


CPIM (माकपा) के अब चल बसे, रिटायर हो गए या कर दिए गए नेताओं की पीढ़ी की अगुआई के दौरान युवा नेता-कार्यकर्ता कहा करते थे कि प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे युवाओं (असल में तब अधेड़) के हाथ में बागडोर आएगी तो पार्टी अपने सच्चे इंक़लाबी ट्रैक पर दौड़ने लगेगी। इन दोनों में से भी करात को ही ज्यादा सिद्धांतवादी और टंच खरा माना जाता रहा था। पार्टी के सर्वोच्च पद पर करात के बाद येचुरी की बारी आई है। इस बीच फासिस्ट ताकतों के खिलाफ देशव्यापी संघर्ष का दम भरने वाली पार्टी अपना गढ़ कहे जाने वाले बंगाल में ही बद से बदतर स्थिति का शिकार होती गई है। देश के मौजूदा हालात के बीच किसी भी प्रगतिशील या सेक्युलर कही जाने वाली पार्टी को ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ ही सकता है। लेकिन, निराशाजनक यह है कि ऐसी विकट परिस्थितियों में CPIM अपने दो सबसे दैदीप्यमान कहे गए सितारों के लगातार टकराव के लिए चर्चा में रही है। यहां तक कि पार्टी के सबसे पुराने नेताओं में शामिल अच्युतानंदन तक को सार्वजनिक अपमान का बार-बार सामना करना पड़ा। खुले में हो रही इन कारगुजारियों को पीत पत्रकारिता या सिनीसिज़्म कहकर टाल पाना भी तब मुमकिन न रहा जब करीब तीन महीने पहले CPIM की सेंट्रल कमेटी की बैठक में से गुस्से से बाहर निकलीं सेंट्रल कमिटी की मेंबर और एडवा की जनरल सेक्रेट्री जगमति सांगवान ने मीडिया के सामने पार्टी के सभी पदों और सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। जगमति को बंगाल चुनाव में करारी हार पर चर्चा के दौरान कांग्रेस से गठजोड़ को लेकर प्रस्ताव की भाषा पर ऐतराज था। उनके मुताबिक हल्के शब्द का इस्तेमाल कर बंगाल में हुई गलती को छुपाने की कोशिश हो रही थी। माना यह भी गया था कि जगमति करात केम्प से थीं और इसलिए इतनी आक्रामक हुई थीं। बहरहाल, पार्टी ने इस्तीफा दे देने वालों को भी निष्कासित करने की अपनी परंपरा जगमति के साथ भी दोहरा दी थी। इसके बाद भी कांग्रेस से गठजोड़ के इस मुद्दे के बहाने पार्टी की भीतरी कलह जारी रही थी। लेकिन, कांग्रेस से गठजोड़ के औचित्य-अनौचित्य की बहस के बीच करात ने अचानक बीजेपी और संघ परिवार को सर्टीफिकेट देते हुए कह दिया कि `देश में अभी जो राजनीतिक हालात हैं, उनमें यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।`

स्वभाविक है कि हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष नेता का यह बयान सकते में डालने वाला था। और यह अचानक `जुबान फिसलने वाला मसला नहीं था`, बाकायदा अखबार में लेख लिखकर छपवाया गया था। अाउटलुक के मुताबिक- इरफान हबीब ने माकपा पोलित ब्यूरो को एक कड़ी चिट्ठी लिखकर पार्टी की राजनीतिक-रणनीतिक लाइन को लेकर सवाल उठाया था। इरफान हबीब के अनुसार, `माकपा को भाजपा एवं संघ परिवार जैसे फासीवादी ताकतों को रोकने के उपाय सोचने चाहिए। न कि कांग्रेस को लेकर बेमतलब की बहस में उलझना चाहिए।` जवाब में प्रकाश कारात का मन्तव्य आया है कि `देश में अभी जो राजनीतिक हालात हैं, उनमें यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है। इन हालात में माकपा को किसी अन्य की जरूरत नहीं। माकपा की वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है।`

करात चाहते तो सिर्फ इतना कह सकते थे कि बंगाल के चुनावी गठजोड़ से लेकर यूपीए सरकार को समर्थन समेत तमाम पुराने अनुभवों और कांग्रेस की राजनातिक-आर्थिक नीतियों के मद्देनज़र अब आगे कांग्रेस से गठजोड़ का कोई तुक नहीं बनता है। माकपा को किसी अन्य की जरूरत नहीं है। वे पार्टी के पारंपरिक वाक्य को भी साथ में रख ही सकते थे कि माकपा की वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है। कांग्रेस से गठजोड़ के विरोध के लिए क्या इतना काफी नहीं था? पर शायद उन्हें बीजेपी-संघ को एक सर्टीफिकेट देने की ही जरूरत थी और यह मुमकिन नहीं है कि वे नहीं जानते थे कि पूरा फोकस इसी पर होना है और इसी पर विवाद खड़ा होना है। सवाल यह है कि इसके पीछे वजह क्या थी। क्या वे संघ के फासिस्ट हिंदुत्ववादी अभियानों के देशव्यापी व्यापक असर के बीच हिंदू जनता को कोई संदेश देना चाहते थे? आखिर, सभी सेक्युलर कही जाने वाली पार्टियां मान ही चुकी हैं कि मुसलमानों पर जुल्मो सितम के मसले पर बहुत कड़े सैद्धांतिक स्टेंड पर रहने से बदली हुई परिस्थितियों में चुनावी राजनीति के लिहाज से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी CPIM ग़रीब मुसलमान जनता का विश्वास वापस हासिल करने में नाकाम रह चुकी थी। केरल में करात के विश्वसनीय माने जाने वाले पी. विजयन ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही अखबारों में जो विज्ञापन जारी किया था, उसमें भी केरल को A Truly God`s Own Country  में तब्दील करने की प्रतिबद्धता जताई थी। दक्षिण में संघ के बढ़ते असर से भी शायद विजयन एंड कंपनी को यह खतरा हो कि भविष्य में केरल में भी कांग्रेस के बजाय मुकाबला बीजेपी से ही हो सकता है। शायद यह अकारण नहीं है कि एक तरफ केरल की CPIM सरकार संघ की शाखाओं को लेकर कुछ कड़े फैसले ले रही हो और तभी केरल के ही पार्टी के सर्वाधिक प्रसार वाले मलयाली मुखपत्र में करात लिख रहे हों कि `यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।`।

हर स्याह-सुफ़ेद के बावजूद सीपीआईएम से उम्मीद का रिश्ता बनाए रहे सेक्युलर कार्यकर्ताओं और पार्टी से बाहर रहकर भी उस पर यक़ीन रखने वालों पर क्या गुजरी होगी, यह सोचकर भी दिल परेशान हो उठता है। पार्टी की सेंट्रल कमेटी या उसके महासचिव तुरंत करात के कथन से पल्ला झाड़ सकते थे। लेकिन, सियासत के उस प्रचलित जुमले `यह उनकी निजी राय है, पार्टी इससे इत्तेफाक नहीं रखती है`, को भी कष्ट देना जरूरी नहीं समझा गया। कुछ लोगों का ख्याल था कि करात का बयान पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के लिए चल रही उठापटक का हिस्सा है। लेकिन, इस बारे में जवाब देने के बजाय बंगाल इकाई भी चुप्पी ही साधे रही। तो क्या बंगाल इकाई और उसके संरक्षक कहे जा रहे सीताराम येचुरी को भी यह भय सताया कि करात के बयान का स्पष्ट विरोध जिस बहस को जन्म दे सकता है, वह बंगाल के हिंदू अभिजात्य और हिंदू मध्य वर्ग को और दूर छिटका सकती है? या फिर जो भी मजबूरी रही हो, पार्टी नेतृत्व की चुप्पी ने करात के कथन को (जो बकौल एक बुजुर्ग कॉमरेड, प्रकाश करात के चेहरे पर bad patch की तरह है) पार्टी के चेहरे पर नहीं चिपका दिया? क्या अब यह नहीं माना जाना चाहिए कि यही पार्टी लाइन है?  
`वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है`, में यूं भी पार्टी के प्राय: हर इलाके के नेतृत्व के लिए व्यापक अपील है। जब कि फासिस्ट झुंड़ कभी भी, कहीं भी, बिना किसी भी वजह के सामूहिक हत्याओं और रेप जैसी वारदातों को उत्सव की तरह अंजाम दे रहे हों, संवैधानिक संस्थाओं को बेमानी किया जा रहा हो, तब सिर्फ मज़दूर एकता ज़िंदाबाद जैसे नारे लगाकर आंखें मूंद लेना ही शायद ज्यादा सुविधाजनक हो। वरना क्या वजह थी कि पार्टी काडर भी अपने नेता के बयान पर खामोशी ओढ़कर बैठ जाए? आखिर एक कार्ड होल्डर का फर्ज़ प्रतिवाद भी होता होगा? लेकिन, एक बड़ा बुद्धिजीवी तबका जो लगातार खुद भी बता रहा था कि फासिस्ट घेरेबंदी हो चुकी है और यह कई मायनों में अभूतपूर्व है, कि यह घेरेबंदी लोकतंत्र को प्रहसन में तब्दील कर बिना किसी इमरजेंसी के ही कर दी गई है, कि फासिस्ट हमारी जनता की चेतना का अपहरण कर चुके हैं, कि मीडिया और देशी-विदेशी पूंजीवादी घराने, कितने ही डोमा उस्ताद और तमाम लुंपन समूह फासिस्टों के साथ खड़े हैं, कि देश को युद्धोन्माद पर रख दिया गया है, कि देश में कई राज्यों में जनता के खिलाफ ही युद्ध जैसी स्थितियां पैदा कर दी गई हैं, कि देश की गरिमा, तमाम संसाधन गिरवी रख दिए गए हैं, कि...। जी, एक बड़ा बुद्धिजीवी तबका जो हमें लगातार फासिस्टों से आगाह कर रहा था, उसे भी अचानक काठ मार गया। क्या उसे अपना लिखा-कहा अब एक पार्टी के नेता के बयान के बाद डिलीट करना था? उस कथन के पक्ष में तर्क जुटाने थे? या हमेशा की तरह हस्तिनापुर की गद्दी से बंधे होने की भीष्म पितामही घुटन में डूबकर मर जाना था? 
लेकिन, जब लंबी प्रैक्टिस बड़े नामों को खामोश रहने पर मजबूर कर दे, तब भी कोई बोल ही पड़ता है। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया बोले-  `एक वामपंथी बुजुर्ग नेता जो कि जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, ने कहा है कि मोदी सरकार निरंकुश है लेकिन फासिस्ट नहीं है. मेरा उन कामरेड से कहना है कि अगर वह और लड़ना नहीं चाहते हैं तो रिटायर हो जाएं और न्यूयॉर्क चले जाएं. हम अपनी लड़ाई खुद लड़ लेंगे.' दूसरी-तीसरी पंक्ति के लोगों से जवाब में जो कहलाया गया, उसमें बौखलाहट ज्यादा थी- 'कन्हैया कल का लड़का, पोस्टर बॉय, अति उत्साही, अचानक लाइम लाइट में आ गया हीरो, उसे सीमा में रहना चाहिए, फासीवाद फासीवाद...हुं...बुर्जुआ..' टाइप। लेकिन, कन्हैया खुद संघर्ष और यातनाओं से गुजर रहे हैं, उनका मजाक उड़ाना उलटा ही पड़ रहा था। इन्हीं कन्हैया को सीपीआईएम चुनाव प्रचार में ले जाने के लिए उतावली थी। बात तो यह है कि इस युवा का आने वाला कल पतनशील भी हो जाए तो भी न उसका आज का संघर्ष बेमानी होगा, न उसका सवाल। असल में, कन्हैया की नसीहत की चोट गहरी थी। एक सज्जन लिख रहे थे कि क्या कन्हैया के कहे से कांग्रेस और भ्रष्ट क्षेत्रीय दलों से समझौते कर लिए जाएं। कोई पूछ सकता था कि क्या आपकी पार्टी अभी तक लगातार यही नहीं करती आई थी। 
लेकिन, गौरतलब यह था कि कन्हैया को दिए जा रहे जवाब में साम्प्रदायिकता का जिक्र भी भेड़िया आया-भेड़िया आया जैसे जुमले से किया जा रहा था। 2 सितंबर की हड़ताल का हवाला देकर कहा जा रहा था कि मजदूरों की लड़ाई यानी वर्ग संघर्ष ही एक रास्ता है। मध्य वर्गीय मसलों को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती है। यह दिमाग़ी पतन, गद्दारी और बेशर्मी का चरम था। क्या सामूहिक हत्याओं का शिकार बनाए गए लोग, बलात्कार का शिकार बनाई गई महिलाएं, जलती आग में फेंक दिए गए बच्चे - ये मध्य वर्ग के मसला थे? 
Jairus Banaji ने प्रकाश करात के जवाब में जो तीखा लेख लिखा, उस पर भी कई दिन गहरी चुप्पी रही। आख़िर अब Vijay Prashad ने उनका रिजोइंडर लिखा है पर वह भी मूल सवाल का जवाब देने के बजाय 2 सितंबर की हड़ताल, वर्ग संघर्ष और फासिज्म की परिभाषाएं ही देता है। आपको याद होगा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद के वर्षों में पहले बीजेपी की केंद्र में साझा सरकार बनने और फिर गुजरात हिंसा के बाद केंद्र में मोदी के बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का प्रधानमंत्री बनने तक कहा जाता था कि देश में इतनी विविधताएं हैं और उसका सेक्युलर ढांचा इतना मजबूत है कि बीजेपी मनमानी करने लायक बहुमत हासिल नहीं कर सकती है। यह भी नसीहत दी जाती थी कि मोदी का जिक्र करना ही मोदी को मजबूती देता है। करात और उनकी बुद्धिजीवी टीम अभी भी न सिर्फ लगभग वैसी ही बातें दोहरा रही है बल्कि नई हास्यास्पद बातें भी कर रही है-  
`There is no imminent crisis to the fractured and complex Indian bourgeoisie, nor is there any indication that the BJP government has the stomach to move against the Constitution or even towards an Emergency regime. The BJP pushes its right-wing agenda, but it is hampered by a host of political adversaries – not only political parties, but also pressure groups and mass sentiment that will not allow it to enact its complete agenda. The fact that one hundred and eighty million workers went on strike shows that there remains wide opposition to the BJP’s ‘labour reform’ agenda, one that is otherwise quite acceptable to large sections of the parliamentary opposition (including the Congress Party).`
हालांकि इस बात का जवाब ऊपर दिया जा चुका है और असल में तो जवाब देना ही गैरजरूरी है कि क्या बीजेपी के संविधान के खिलाफ जाने या इमेरजेंसी लाने की संभावनाएं हैं। और क्या यह सब करने के लिए इमरजेंसी की जरूरत है? क्या आपके नेताओं और बुद्धिजीवियों के पुराने कहे-लिखे और आपके अखबारों के पन्नों को ही आपके आगे नहीं कर दिया जाना चाहिए? क्षेत्रीय दलों और प्रेशर ग्रुप्स के हालात और नतीजों पर भी क्या अलग से रोशनी डालने की जरूरत है? और मास सेंटीमेंट? क्या सारा खेल मास सेंटीमेंट पर ही नहीं खेला जा रहा है? क्या मास सेंटीमेंट के नाम पर ही घरों में घुसकर हत्याएं नहीं की जा रही हैं? क्या आपको याद है कि फांसी के फैसले तक में The collective conscience of the society का हवाला दिया जा चुका है? 
आप अब एक खोज लाते हैं कि आरएसएस की विचारधारा फासिस्ट न होकर सेमी फासिस्ट है। क्योंकि `it can never hope to achieve hegemony over the popular imagination, but has to impose its fascistic ideology from above, through the institutions, by manipulation of the media, by deceit rather than by the creation of conviction.` काश इतना भी सही होता। संघ का यक़ीन मीडिया और तमाम संस्थाओं पर कब्जे से ज्यादा  popular imagination पर ही रहा है। या कहिए कि इसी रास्ते से वह इस स्थिति में पहुंची है कि पूंजीवादी ताकतें और अमेरिका उस पर यकीन कर सके कि उनके एजेंडे को निर्बाध ढंग से लागू करने की क्षमता कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी में है। popular imagination पर असर डालकर या वहां पहले ही मौजूद कचरे से तालमेल कर वह तमाम संस्थाओं को कब्जाने और संचालन करने की स्थिति में पहुंचा है। हकीकत यह है कि इतनी विशाल पार्टी होने और संघर्षों का इतिहास होने के बावजूद CPIM और दूसरी सेक्युलर शक्तियां इस मोर्चे पर सबसे ज्यादा नाकाम रही हैं।  
``Fissures along caste and regional lines are too deep to allow the RSS to dig its roots into the Indian popular imagination. If it elevates Hindi, it will alienate Tamils. If it pushes the Ram Mandir, it does not speak as loudly to Bengalis as those who read Tulsidas. The BJP – the electoral arm of the Parivar – finds it hard to break into regions of India where the RSS is not as powerful. It makes alliances. These are opportunistic. These alliances strengthen the BJP in Delhi, but do not allow it to penetrate the popular consciousness elsewhere.`` क्या कोई भोलेपन से इन बातों पर यक़ीन कर सकता है? जाति और क्षेत्रवाद के गड्ढ़ों का सबसे ज्यादा फायदा संघ ने ही उठाया है. दलितों और पिछड़ों से घोषित घृणा के बावजूद, आरक्षण का सैद्धांतिक विरोध करने के बावजूद अपने अभियानों में इनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी करने की कुव्वत को संघ साबित करता रहा है। लगभग एक ही खित्ते में वह एक जगह एक जाति की घृणा का इस्तेमाल कर सकता है और लगभग उसी जगह में दूसरी जाति की घृणा का। हरियाणा और वेस्ट यूपी के दंगों का अध्ययन आपके काम का हो सकता है। बंगाल, नोर्थ ईस्ट, साउथ कहां उसकी ताकत नहीं है? दरअसल, कॉमन सेंस का जैसा निर्माण या इस्तेमाल संघ ने किया है और जिस तरह की सामग्री लगातार वॉट्सएप और सोशल मीडिया के दूसरे साधनों से लगातार प्रसारित होती है और उसका जैसा असर होता है, उसका कोई अनुमान आपको क्यों नहीं है? ऐसा नहीं है कि दूसरी संभावनाएं नहीं थीं या नहीं हैं, पर या तो इस मोर्चे पर ईमानदारी से काम नहीं किया गया या फिर इसका हवाला देकर काम चलाया जाता रहा।

`When the BJP is on the RSS’s (and VHP’s) turf, then matters are different. The Gujarat pogrom of 2002 took place in a setting where the RSS and the VHP had prepared the terrain.`  ऐसी बातों पर क्या कहा जाए? बीजेपी कहां आरएसएस (हां VHP भी तो वही है) के टर्फ पर नहीं है? जहां बीजेपी आपको अकेली मजबूत नहीं दिखाई देती, वहां भी आरएसएस टर्फ बिछा रही होती है या बिछा चुका होता है। आप क्या नहीं जानते हैं कि नॉर्थ ईस्ट में भी, केरल में भी, बंगाल में भी? कई बार अपनी रणनीति के तहत उस टर्फ पर वह दूसरी पार्टियों को चलने दे रहा होता है। 
कांग्रेस के साथ गठजोड़ न करें, आप अकेले संघर्ष करें, इससे क्या एतराज हो सकता है? सवाल आपकी इसी लाइन से है- `यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।`। 
और इसके बचाव में आपके तर्कों से। `वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है` कहते हुए आप अरसे तक दलितों और स्त्रियों के सवालों से मुंह मोड़ते रहे। आपके नेतृत्व से वे गायब रहे और फिर तमाम संघर्षों के बावजूद आप उन तबकों में विश्वसनीयता खोते रहे। एक सवाल आपसे लगातार और अब सच्चर आयोग का हवाला देकर पूछा ही जाता रहा है कि आखिर बंगाल में इतने बरसों के शासन में मुसलमान और दूसरे कमजोर तबकों की हालत इतनी दयनीय क्यों रही। यह भी कि आदिवासी क्षेत्रों में जब भयंकर दमन शुरु हुआ, तो आप कहां खड़े थे? सोनी सोरी तो नक्सलवादी नहीं थीं। यदि वे नक्सल या संघ की भी कार्यकर्ता होतीं तो भी एक स्त्री की योनि में पत्थर भर देने के कृत्य के इतना चर्चित हो जाने के बावजूद आप की महिला विंग तक खामोश क्यों बनी रहीं? क्या वजह है कि आपके पास बुद्धिजीवियों का बड़ा जखीरा होने के बावजूद मुश्किल मसलों पर खामोशी छा जाती थी और अरुंधति जैसे ऑथेंटिंक स्वर आप बर्दाश्त नहीं कर पाते थे? क्या आप जानते हैं कि लेफ्ट के लिए सरकार बना पाने से ज्यादा मूल्यवान अगर कुछ है तो विश्वसनीयता ही है? और क्या आप जानते हैं कि ताजा प्रकरण में आप वही खो रहे हैं?
जहां तक 2 सितंबर की हड़ताल का सवाल है, तो आपको सलाम। लेकिन अगर आप इसे और हड़ताल में शामिल `one hundred and eighty million` लोगों के शामिल होने को करात की लाइन (जो कि अब पार्टी लाइन ही लगती है), का कवच बनाएंगे तो हमें आपको बताना पड़ेगा कि इनमें एक हिस्सा उस मध्य वर्ग और सरकारी नौकरियों के पैसे से उच्च वर्ग में तब्दील हो चुके लोगों का भी था, जिसे प्राथमिकता न देने के नाम पर आपके लोग साम्प्रदायिकता के सवाल को भेडि़या-भेड़िया आया करार देने लगते हैं। और हड़ताल में शामिल होने व इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगा लेने के बावजूद इस तबके की प्राथमिकता में भी ये सब सवाल शामिल नहीं हैं। वेतन बढ़वाने के लिए इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाने वालों की बड़ी संख्या बीेजपी को वोट भी करती रही। यह बात किसी हद तक कमजोर तबके के मजदूरों के बारे में भी कही जा सकती है। यह बताने का मक़सद आंदोलन को प्रश्नांकित करना नहीं है बल्कि यह याद दिलाना है कि इसकी ओट में आप एक बुरे रास्ते पर चल पड़ने का बचाव नहीं कर सकते।

(मेरी अंग्रेजी कमजोर है और आपकी बातें अंग्रेजी में ही होती हैं। मेरी मूल चिंता को न भूलिएगा और अपने कदमों को उस रास्ते से वापस खींचिएगा तो आपका सबसे बड़ा अहसान लेफ्ट लीगेसी पर होगा।)
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प्रकाश करात का इलस्ट्रेशन Hindustan Times की साइट से साभार
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(आप यह पोस्ट KAFILA पर अंग्रेजी में भी पढ़ सकते हैं।)

Friday, December 4, 2015

कूलर साहब का इंतज़ार : नदीम एफ़. पराचा

अहमद परवेज़ की पेंटिंग
राची में हाल ही में तामीर हुए क्लिफ्टन फ़्लाइ-ओवर का अच्छा-ख़ासा हिस्सा सूफ़ी संत अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी की मज़ार से होकर गुज़रता है. कुछ दो महीने पहले उस पर ड्राइव करते हुए मुझे लगा कि मैंने एक मलंग को देखा है जिसे मैं कभी जानता था.
फ़्लाइ-ओवर जहाँ ख़त्म होता है उसके दाहिनी तरफ बने फुटपाथ पर वह पड़ा था. करीब से देख सकूँ इसलिए मैंने गाड़ी धीमी की और वाकई वही था हालाँकि अब वह सत्तर पार की उम्र में था. मैंने उसे तेईस सालों से नहीं देखा था मगर मुझे उसकी शक्ल अच्छी तरह याद थी और खासकर उसका नाम: खस्सू.
मैंने गाड़ी फुटपाथ के करीब ली जहाँ वह बड़े आराम से से सोया हुआ था. गाड़ी का शीशा नीचे कर मैं चिल्लाया, ‘खस्सू!खस्सू!’
मगर खस्सू जवाब ही नहीं दे. मैंने अपनी गाड़ी फुटपाथ के किनारे खड़ी करने की कोशिश की ताकि नीचे उतर सकूँ, मगर गाड़ियों का एक रेला मेरी गाड़ी के पीछे जमा होना शुरू हो गया था, और उनके ड्राइवर इस कदर दीवानावार हॉर्न बजा रहे थे जैसे कि उनकी ज़िंदगियाँ उस पर टिकी हुई हों.
मैंने सहज बोध से गाड़ी बाएँ लेकर रास्ते के बीच में ली और आगे बढ़ा. करीब हफ़्ते भर बाद मैं खस्सू को ढूँढने फिर गया मगर वह कहीं नहीं मिला.
लगभग 1995 तक अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार के बिलकुल पीछे कुछ अपार्टमेंट्स की कतार हुआ करती थी. ये अपार्टमेन्ट साठ के दशक में बने थे और वहां पार्किंग की काफी बड़ी जगह थी. मैं और मेरे कुछ दोस्त वहाँ अक्सर क्रिकेट खेलने जाया करते. ये अस्सी और नब्बे के दशक के शुरूआती सालों के दरमियान की बात है.
1995 के बाद उन अपार्टमेंट्स को तोड़ने की शुरुआत हुई और आज उस प्लाट पर रियल इस्टेट टाइकून मलिक रियाज़ द्वारा एक विशाल इमारत बनाई जा रही है.
अस्सी के दशक के आखिरी सालों में मैं अपने दोस्तों के साथ शाह ग़ाज़ी मज़ार पर (ज़्यादातर कुतुहलवश) अक्सर जाया करता, खासकर जुमेरात की शामों को जब वहाँ कव्व्वाली की महफ़िलें लगतीं. पता नहीं वे महफ़िलें अब भी लगती हैं या नहीं मगर नब्बे के दशक के शुरूआती सालों तक हर जुमेरात को दस बजे से लेकर आधी रात तक कव्वाली की महफ़िलें बिलानागा लगा करतीं.
खस्सू से से मेरी पहली मुलाक़ात यहीं हुई थी. मेरा ख़याल है ये 1987 की बात है. हमने उम्र के महज बीस साल पूरे किए थे. खस्सू वहाँ था, हमेशा हरे रंग के लहराते कुर्ते में, बहुरंगी फ़कीराना टोपी, सफ़ेद होती छोटी दाढ़ी और कलाइयों पर बहुत से कड़े पहने.
अगर वह कव्वाली में नहीं है (जहाँ वह आम तौर पर होता) तो एक लफ्ज़ न बोलता. जब गाना-बजाना अपने चक्करदार उरूज पर पहुँचता तो खस्सू नंगे पैर कूद कर एक दिलचस्प अराजक नृत्य (धमाल) शुरू करता; लगातार ‘हक़, हक़, हक़ अल्लाह!’ चिल्लाता हुआ. कव्वाली के बाद फ़ौरन वह अपनी हमेशा की ग़मगीन अवस्था में लौट जाता.
एक दिन मेरे एक दोस्त ने एक और मलंग से पूछा कि खस्सू की क्या दास्ताँ है. उसने हमें बताया कि खस्सू को उसके बचपन में मज़ार के फाटक पर छोड़ दिया गया था (जो पचास के दशक का आखिरी दौर रहा होगा). तब से वह यहीं रह रहा है.
उस मलंग ने हमें बताया कि खस्सू हमेशा से इस तरह खामोश (या ग़मगीन) नहीं था. और फिर एक शानदार कहानी सामने आई. उसने कहा, ‘खस्सू इंतज़ार कर रहा है.’
किसका इंतज़ार?’कूलर साहब का....’ उसने जवाब दिया. वह दरअसल कहना चाहता था कलर साहब.
कूलर साहब कौन थे? वह मलंग तुरंत उर्दू छोड़ पंजाबी पर आ गया: ‘कूलर साहब (मज़ार के मलंगों के) अज़ीज़ दोस्त थे. खासकर के खस्सू के. खस्सू अब भी उनका मुन्तज़िर है.
कूलर साहब गए कहाँ? “ख़ुदा के पास,’ मलंग ने हमें बताया.
फिर खस्सू क्यों अब भी उनका मुन्तज़िर है? कूलर साहब ने उससे कहा था कि के वह उस ड्राइंग को पूरा करने लौटेंगे जो वह खस्सू के लिए बना रहे थे,’ मलंग ने समझाया. ‘मगर वह कभी नहीं आए. हमें पता चला कि उनका इंतकाल हो गया. मगर खस्सू ने कभी इस बात पर यकीन नहीं किया. वह अब भी उनका इंतज़ार कर रहा है.
अगले कुछ महीनों में हमें मालूम हुआ कि कूलर साहब कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तान के अग्रणी मुसव्विरों में से एक अहमद परवेज़ थे. परवेज़ का 1979 में इंतकाल हो गया था.
रावलपिंडी में पैदा हुए परवेज़ ने चित्रकार के तौर पर अपने करियर की शुरुआत पंजाब विश्वविद्यालय से की थी. चूंकि वे एक बेचैन रूह के मालिक थे, वे जल्द ही 1955 में लन्दन चले गए.
साठ के दशक के आखिरी दौर में वे पाकिस्तान लौटे और कराची में आ बसे. सत्तर के दशक में मुल्क के प्रमुख कलाकारों में उनका शुमार होने लगा और कराची शहर के उस वक़्त फलते-फूलते कला पटल पर उनका गहरा प्रभाव था.
अपने प्रशंसकों से घिरे होने के बावजूद बेचैन और बेक़रार बने रहे, कभी संतुष्ट न होने वाले.
उनकी जीवन शैली और भी अनियमित होने लगी. यूके, यूएस और पाकिस्तान के कला समीक्षकों द्वारा जीनियस कहे जाने को लेकर और अपनी कृतियों के लिए बड़ी आसानी से खरीदार पाने को लेकर बेपरवाह परवेज़ के बारे में उनके एक समकालीन ने टिप्पणी की कि वे पैसे के साथ ऐसा बर्ताव करते थे ‘जैसे उससे उन्हें नफरत हो.’
कला समीक्षक सलवत अली ने (डॉन अखबार में) परवेज़ के प्रोफाइल में लिखा कि ‘उपद्रव और बातचीत में बेहद उत्तेजित हो जाना परवेज़ की प्रवृत्ति थी.’ ग्लोबल पोस्ट की उप-सम्पादक और कला समीक्षक मरिया करीमजी अपने पाठकों को बताती हैं कि ‘1970 के दशक में मुल्क के माने हुए कलाकारों में से एक अहमद परवेज़ अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार में नियमित रूप से आते थे और उन्हें वहां हाथों में चिलम लिए अक्सर देखा जा सकता था.’
कला समीक्षक और परवेज़ के समकालीन बताते हैं कि उन्होंने जितना पैसा कमाया वह सब शराब पर खर्च हो जाता था. जो लोग उनकी सोहबत में आ रहे थे, उनसे उकताकर वे कराची की विभिन्न सूफ़ी मज़ारों पर जाने लगे. कराची की अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार पर वे नियमित रूप से आने लगे.
कला समीक्षक ज़ुबैदा आग़ा अहमद परवेज़ पर केन्द्रित एक आलेख में कहती हैं कि जैसे-जैसे उनकी शोहरत बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनकी जीवन शैली और भी अनियमित और ‘अस्वास्थ्यकर’ होती गई.
1970 के दशक के अंत तक वे लगभग स्थायी रूप से अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार के मैदानों पर रहने लगे. उसी दौरान खस्सू के साथ उनका याराना हुआ होगा.
लाहौरवासी कलाकार मक़बूल अहमद ने, जो 1970 के दशक के आखिरी सालों में लाहौर कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स के छात्र थे, मुझे बताया कि कैसे वे अपने आदर्श अहमद परवेज़ से मिलने कराची आए मगर जो दिखाई दिया उससे भौंचक्का रह गए. ‘ये 1978 की बात है. परवेज़ ख़स्ताहाल थे. न उन्होंने मेरी तारीफ़ तस्लीम की और न मौजूदगी. वे बेहद परेशान थे, मगर किसी की समझ में नहीं आता था कि ऐसा क्यों था.’
मक़बूल ने बताया कि परवेज़ लाखों रुपये कमा सकते थे: ‘उन्होंने थोड़ा पैसा कमाया भी मगर ऐसा लगता था कि उनकी उसमें दिलचस्पी नहीं थी. वे ऐसा बर्ताव करते जैसे वे उन लोगों को अपनी आत्मा बेच रहे हों जिन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उनकी कला के मानी क्या हैं.’ मक़बूल ने फिर कयास लगाया, ‘शायद इसी अपराध बोध ने उन्हें बेघर मलंगों के हाथों में पहुँचा दिया?’
सरकार द्वारा प्रतिष्ठित प्राइड ऑफ़ परफॉरमेंस अवार्ड से नवाजे जाने पर भी परवेज़ की परीशां जीवन-शैली जारी रही. और फिर वह हो गया. और किसी को ताज्जुब नहीं हुआ.
1979 में वे अचानक गिरे और होटल के कमरे में मृत पाए गए. वह होटल कराची में आई.आई. चुन्द्रिगर रोड के करीब वाला बॉम्बे होटल था जो अब बंद हो चुका है.
अहमद परवेज़
परवेज़ द्वारा खुद अपने पर थोपे गए एकाकीपन और बर्बाद कर देने वाली जीवन शैली पर रंज करते हुए एक कला समीक्षक ने डॉन अखबार के लिए लेख में यह जोड़ा कि ‘अहमद परवेज़ में अभी बीस और सालों की प्रतिभा शेष थी. मगर शायद इस प्रतिभा ने ही उनकी तकदीर का फैसला इस ट्रेजिक अंदाज़ में कर दिया.’
मैं अब इस बात से वाकिफ़ हूँ कि मज़ार पर उनका दोस्त खस्सू अब भी ज़िन्दा है. हालाँकि जब मैंने उसे आखिरी बार देखा तब वह सो रहा था, मगर ऐसा लगा कि वह अब भी कूलर साहब का इंतज़ार कर रहा था. और उस ड्राइंग का जिसका वादा उससे 36 साल पहले किया गया था.

मशहू पत्रकार नदीम एफ. पचा का यह पीकूलर साहब का इंतज़ार भारत भूषण तिवारी ने अनुवाद कर `एक ज़िद्दी धुन` के लिए भेजा है।

Monday, October 19, 2015

नफ़रत की संस्कृति का विरोध ज़िंदगी की पहचान है : लाल्टू






देश भर में तकरीबन पचीस साहित्यकारों ने अपने अर्जित पुरस्कार लौटाते हुए मौजूदा हालात पर अपनी चिंता दिखलाई है। जब सबसे पहले हिंदी के कथाकार उदय प्रकाश ने पुरस्कार लौटाया तो यह चर्चा शुरू हुई कि इसका क्या मतलब है। क्या एक लेखक महज सुर्खियों में रहने के लिए ऐसा कर रहा है। और दीगर पेशों की तरह अदब की दुनिया में भी तरह-तरह की स्पर्धा और ईर्ष्या हैं। इसलिए हर तरह के कयास सामने आ रहे थे। उस वक्त भी ऐसा लगता था कि अगर देश के सभी रचनाकार सामूहिक रूप से कोई वक्तव्य दें तो उसका कोई मतलब बन सकता है, पर अकेले एक लेखक के ऐसा करने का कोई खास तात्पर्य नहीं है। अब जब इतने लोगों ने पुरस्कार लौटाए हैं, यह चर्चा तो रुकी नहीं है कि सचमुच ऐसे विरोध से कुछ निकला है या नहीं, पर साहित्यकारों को अपने मकसद में इतनी कामयाबी तो मिली है कि केंद्रीय संस्कृति मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी बौखलाहट दिखला गए। तो क्या ये अदीब बस इतना भर चाहते थे या इसके पीछे कोई और भी बात है।

आम तौर से कई अच्छे रचनाकार सीधे-सीधे ऐसा कोई कदम लेने से कतराते हैं जिसमें सियासत की बू आती हो। खास तौर पर साहित्य अकादमी जैसी संस्था को जो स्वायत्तता मिली हुई है, उसे बनाए रखना और राजनीति से उसे दूर रखना ज़रूरी है। पर सियासत की जैसी समझ अदब की दुनिया के लोगों को होती है, वैसी आम लोगों में नहीं होती। सियासत में उतार-चढ़ाव से इंसानी रिश्तों में कैसे फेरबदल आते हैं, इसकी समझ किसी भी अच्छी साहित्यिक कृति को पढ़ने से मिल सकती है। यहाँ तक कि प्राचीन महाकाव्यों में भी यही खासीयत होती थी कि उनमें समकालीन सियासी दाँव-पेंच के बीच पिसते इंसानियत की तस्वीर होती थी। महाभारत को तो इसका आदर्श माना जा सकता है। इसलिए जब इतने सारे अदीब एक साथ ऐसा कदम ले रहे हैं तो वह महज सुर्खियों में रहने के लिए उठाया गया कदम नहीं है। जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने नाइट की उपाधि वापस कर दी थी तो वह एक ऐतिहासिक कदम था। कुछ ऐसा ही आज के साहित्यकार कर रहे हैं। कोई कह सकता है कि रवींद्र तो जालियाँवाला बाग हत्याकंड के विरोध में ऐसा कर रहे थे। क्या ऐसा कुछ हुआ है जिसे उस हत्याकांड के बराबर माना जा सकता है? यह वाजिब सवाल है और इसका जवाब यह है कि हाँ, आज ऐसा ही एक ऐतिहासिक समय है। मुजफ्फरनगर से लेकर दादरी तक हमारे सामने एक के बाद एक भयंकर घटनाएँ होती जा रही हैं। चुनावों में बुनियादी समस्याओं की जगह इस पर बात होती है कि आप का खान-पान क्या है। राजनैतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं में भाषा से लेकर व्यवहार के हर पहलू में हिंसा बढ़ती जा रही है। अदीब इस बात को समझ रहे हैं कि उनकी ऐतिहासिक भूमिका है कि वे इस देश को तबाह होने से बचाएँ।

एक सामान्य किसान या कामगार को भड़काना आसान होता है। देश, धर्म, जाति आदि कई हथियार हैं जिनसे एक आम आदमी को उसके शांत सामान्य जीवन से भटकाकर उसे हत्यारी संस्कृति में धकेल देना संभव है। ऐसा होता रहा है। जब तक यह सीमित स्तर तक होता है, उदारवादी लोग इसे दूर से देखते हैं और कुछ कह सुनकर बैठ जाते हैं। हमारे ज्यादातर लेखक कवि ऐसे ही हैं। पर जब बात यहाँ तक आ जाती है कि आस-पास समूची इंसानियत खतरे में दिखती हो तो यह लाजिम है कि साहित्यकारों को सोचना पड़े। सही है, 1984 में सब ने पुरस्कार नहीं लौटाए, 2002 में भी नहीं लौटाए। यह पुरस्कृत रचनाकारों की सीमा थी। शायद तब इतना साहस नहीं था जितना आज वे दिखला पा रहे हैं। यह भी है कि इनमें से अधिकतर को तब पुरस्कार मिले नहीं थे। वे इसे अलग-अलग तर्क देकर ठीक ठहराते होंगे। पर ये बातें कोई मायना नहीं रखतीं। आज सांप्रदायिक ताकतों का राक्षस हर अमनपसंद इंसान को निगलता आ रहा है। ऐसे में हमारे अदीब उठ खड़े हुए हैं और उन्होंने अपनी ऐतिहासिक भूमिका को समझा है, यह महत्वपूर्ण बात है।

जो लोग भाजपा के समर्थक हैं या जो संघ परिवार की गतिविधियों को देश के हित में मानते हैं, उन्हें तकलीफ होती है कि उनके विरोध में इतनी आवाजें उठ रही हैं। कल्पना करें कि अफ्रीका के किसी मुल्क में बिना किसी तख्तापलट के देश के गृह मंत्री को अल्पसंख्यकों का कत्लेआम करवाने के लिए सज़ा--मौत हो जाती है। ऊपर की अदालत इसे आजीवन कारावास में बदल देता है और देश की सरकार कुछ वक्त तक अपने ही मंत्री को मृत्युदंड देने के लिए अदालत में पैरवी करती है। इस सरकार के साथ काम कर रहे पुलिस प्रमुख और दीगर अधिकारियों को फर्जी मुठभेड़ों के लिए कई सालों की कैद होती है। हमारी नस्लवादी सोच के लोग यही कहेंगे कि अरे ये अफ्रीकी ऐसे ही होते हैं, साले मारकाट करते रहते हैं। यही बात जब आज़ादी के बाद पहली बार हमारे देश में एक राज्य की सरकार के साथ होता है, और हमें कुछ भी ग़लत नहीं लगता तो यह गहरी चिंता की बात है। उल्टे सांप्रदायिक नफ़रत की संस्कृति बढ़ती चली है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि देश की सारी समस्याएँ अल्पसंख्यकों की वजह से हैं, जो कुल जनसंख्या का पाँचवाँ हिस्सा हैं। विज्ञान और तर्कशीलता से दूर पोंगापंथी सोच को लगातार बढ़ाया जा रहा है। रचनाकारों का विरोध संघ परिवार के साथ जुड़े काडर को और आम लोगों को यह सोचने को मजबूर करेगा कि क्या वे सही रास्ते पर हैं।

आज़ादी के बाद पहली बार हम ऐसी स्थिति में हैं कि पाकिस्तान जैसे ग़लत माने जाने वाली विचारधारा के मुल्क के लोग खुद को हमारे नागरिकों से बेहतर मान सकते हैं। न केवल दानिशमंद अदीबों की हत्याएँ हुई हैं, महज इस अफवाह पर कि एक जानवर को मारा गया है, एक इंसान का कत्ल हुआ। बेशक गाय महज जानवर नहीं है, इसके साथ आस्थाएँ जुड़ी हुई हैं, पर जब भीड़ कानून को अपने हाथ ले लेती है और यह आम बात बनती जा रही है तो सोचना लाजिम है कि हम कहाँ जा रहे हैं। ऐसी घटनाओं पर जो भी कारवाई हो रही है, उस पर किसी को यकीन नहीं है। सरकार पर आम आदमी का कोई भरोसा नहीं रह गया है। ऐसे में अगर पढ़ने लिखने वाले लोग विरोध के तरीके न ढूँढें तो कोई उन्हें ज़िंदा कैसे कहे! सृजन बाद में आता है, पहले तो जीवन है। नफ़रत और हत्या की संस्कृति का विरोध ज़िंदगी की पहचान है। इसलिए हमारे अदीब विरोध में सामने आ रहे हैं। 1905 में बंगभंग के विरोध में रवींद्रनाथ साथी रचनाकारों के साथ सड़क पर उतर आए थे। बंगाल की अखंडता को लेकर तब उन्होंने कविताएँ और गीत लिखे थे जो आज तक पढ़े गाए जाते हैं। आज वक्त है कि हमारे कवि लेखकों को सड़क पर उतरना होगा। लोगों तक संवेदना के जरिए यह पैगाम ले जाना होगा कि इंसानियत को बचाए रखना है। विविधताओं भरी हमारी साझी विरासत को बचाए रखना है। तर्कशील तरक्कीपसंद भारत को बचाए रखना है।

कवि की यह तस्वीर सतीश कुमार ने रोहतक में क्लिक की थी।
(यह लेख दैनिक भास्कर के `रसरंग` में प्रकाशित हो चुका है।)

Monday, October 12, 2015

एक बस अपील...लौटा दीजिए पुरस्कार : शिवप्रसाद जोशी



साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने चाहिए. जिनके पास जिन जिन वक़्तों के पुरस्कार हैं. वे सब आगे आएं और अपने पुरस्कार लौटा दें. इस फेर में न फंसे कि इसका कोई मूल्य नहीं, कि ये निजी शहादत है, कि इसका कोई हासिल नहीं, कि पैसा कैसे चुकाएंगें, कि साहित्य अकादमी तो सरकारी यूं भी नहीं हैं आदि आदि. और इधर तो एक जालसाज़ी ये भी हो रही है कि कह रह हैं कीर्ति भी लौटाओ. जैसे कीर्ति वहां से अर्जित हुई होगी. पूरा हिसाबकिताब ऐसे ढंग से पेश किया जा रहा है कि ख़बरदार अगर लौटाया तो ये हिसाब ध्यान रखना. ऐसी बेशर्मी, ऐसी ख़ुराफ़ात, ऐसा मज़ाक, ऐसी अपमान और ऐसा फ़ाशीवादी रवैया इस देश में आन पड़ा है तो क्या अचरज?

वरिष्ठो, आगे आइए और ये पुरस्कार लौटा दीजिए. इसके गहरे निहितार्थ होंगे. आप सब जानते हैं. दुनिया भर के लोगों में संदेश जाएगा. जा रहा है. प्रतिरोध आंदोलनों को मज़बूती मिलेगी. लोग और जुटेंगे. एक बड़ी अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का समर्थन होगा. एक चेन बनेगी. विश्व शक्तियों की नई धुरियों का नया जनतांत्रिक और अवाम केंद्रित विलोम तैयार होगा. आप पुकारे जाएंगें. आपको सलाम होगा. 

और हम, साथियो, हम लोग न ताकें न रुकें न चुप रहें. बोलें. भरसक. लिखें. आश्वासन और राहतें और छलावे और पेशकशें और ऑफ़र लौटा दें. सरकारों को ख़बरदार करें. आपने यूं ही जन्म नहीं लिया है. एक सार्थक जीवन की परिभाषा और उद्देश्य क्या होता है. ये बताने का पुरज़ोर समय है. हम लोग दलाली नहीं कर सकते हैं. हमारे वरिष्ठ दलाल नहीं हो सकते हैं. हम लोग मनुष्य हैं और हम लोगों का एक जीवन है जो सुंदर है जिसमें प्रेम है, परिवार है परिजन और दोस्त और संबंधी हैं, और ये सारी की सारी दुनिया है. हम लोग ख़ुशकिस्मत हैं फिर घेरा डाले हुए हमारे आसपास ये ताक़तें कौन हैं. ये हमारा अच्छा बुरा क्यों तय करेंगी, हम खुद क्यों नहीं? इन घेरों की जगह तो हमारी सदियों से बनाई हुई मनुष्यता के डेरे होने चाहिए.

लोग सवाल कर रहे हैं और इस विश्वव्यापी प्रायोजित जय-जय के बीच संदेह में हैं. कि आखिर ये जयगान उस देश से आ रहा है जहां मांस और इंसान के बीच जीवन और मौत का संघर्ष चल रहा है. पूंजीवादी व्यवस्थाएं जब फ़ाशीवाद से गठबंधन करती हैं तो ऐसा ही होता है. ऐसा इस देश की प्राचीनता में नहीं हुआ था. इतिहास की विकृति हावी है. और ये कहने वाले लोग कम होते जा रहे हैं कि भारत में ऐतिहासिक सच्चाई ये है कि यहां मांस खाया जाता था.
अब इस मांस भक्षण का विरोध इतना प्रबल है कि मनुष्य भक्षण पर आमादा ताक़तें फैल गई हैं और उन्होंने जैसे विचार पर ही क़ब्ज़ा कर लिया है. 

लोग या तो मांस के नाम पर मारे जा रहे हैं या महिमा न करने के अपराध में. अगर आप अनवरत जयजय में शामिल नहीं हैं तो आप समाज विरोधी, जाति विरोधी, धर्म विरोधी और देशद्रोही हैं.

तो साथियो, जो किसी भी तरह की फ़ाशीवादी सुविधा के घेरे में हैं उन्हें छोड़ें, जिनके पास सरकार के दिए पुरस्कार हैं, उन्हें लौटा दें. भले ही वो किसी भी पार्टी या समूह या गठबंधन की सत्ता के दौरान के हों. या किसी और दौर के.
आज क्या कर सकते हैं और किस चीज़ का क्या अर्थ हो सकता है, इसे सोचें. लेकिन इसमें आगामी जीवन का मोलभाव न सोचें. आगामी सिर्फ़ मौत है या उससे कम कोई दयनीय हालत. आप हंसेंगे, दैनन्दिन काम निपटाएंगें, दावतों में जाएंगें, घरबार करेंगें लेकिन मौत आपके साथ ऐसे चलेगी जैसे आप उसकी गिरवी रखी हुई कोई चीज़ हों.
वरना तो मौत स्वाभाविक रूप से आती ही है. आकस्मिक भी आती है, और लड़कर भी.... लेकिन आप उस समय इंसान होते हैं- विवशता, इच्छा, लालच, किंकर्तव्यविमूढ़ता, फ़र्माबरदारी और जहालत से भरा हुआ कोई बोरा नहीं जिसे किसी ने जीवन के कगार से हमेशा हमेशा के लिए धकेल दिया हो.


पेंटिंग : Renato Guttuso, The Massacre 1943, Oil on canvas