Saturday, November 5, 2016

कम्बख़्त दस्तावेज़ `पासपोर्ट` और नानी का इंतिक़ाल



(सईद नक़वी की पुस्तक ‘बीइंग दि अदर: दि मुस्लिम इन इण्डिया` (अलिफ़ बुक कंपनी, 2016) के एक अध्याय ‘ग्रोइंग अप इन अवध’’ का हिस्सा )
अनुवाद और प्रस्तुति : भारतभूषण तिवारी


हमारे समरसतापूर्ण अस्तित्व और मुक्त सांस्कृतिक अंतर्मिश्रण के चलते 1947 में हुए बँटवारे का दर्द कुछ गहरा था क्योंकि घनिष्ठता से जुड़े कुनबे भी अकस्मात् बंट गए. यह ज़िन्दगी की एक दर्दनाक विडम्बनाओं में से एक है कि हमारी इतनी अच्छी ख़ाला-नानी, नानी अम्मी, जिन्होंने हमेशा मुस्तफ़ाबाद में दफ़नाए जाने का ख़्वाब देखा था, लाहौर में अल्लाह को प्यारी हुईं. उनका शरीर हिंदुस्तान वापिस नहीं लाया जा सका और हम उनके जनाज़े में शरीक नहीं हो सके. आज के दौर में,  जहाँ छोटे परिवार बढ़ते जाते हैं, ख़ाला-नानी शायद दूर की रिश्तेदार लगे, मगर हमारे परिवार में ऐसा नहीं था जो कि पारम्परिक संयुक्त परिवार व्यवस्था पर आधारित था. मेरी अम्मी की अम्मी अपने कुनबे में सबसे बड़ी थीं और नानी अम्मी सबसे छोटी. मेरी अम्मी से उनका ख़ास लगाव था जिनकी निगहबानी में वह बड़ी हुई थीं. इसका नतीजा यह नहीं हुआ कि नानी अम्मी के अपने बच्चों का ख़याल न रखा गया हो; एक दूसरे पर अत्यधिक आश्रित रहने वाली उस व्यवस्था में उनके अपने बच्चों का ख़याल औरों ने रखा. दरअसल, जैसा कि मैंने पहले बताया, मुस्तफ़ाबाद का हमारा घर ममेरे-फ़ूफ़ेरे-मौसरे भाई-बहनों, मामियों-मौसियों-फूफियों और मामाओं-फ़ूफ़ाओं-मौसियों से भरा रहता (जिनकी तादाद मुहर्रम, बच्चा पैदा होने, किसी की मौत होने या शादी-ब्याह के मौकों पर सौ तक पहुँच जाती).

अपने इंतकाल के दिन तक नानी अम्मी को पासपोर्ट नामके दस्तावेज़ को समझने में बेहद मुश्किल हुई. वह इस इल्म के साथ बड़ी हुई थीं कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए फ़क़त रेलगाड़ी के टिकट की दरकार होती है.  यह बात आसानी से समझ में आती है क्योंकि पहले की उनकी सारी यात्राएँ यूपी में अवध तक सीमित रहीं. वह बाराबंकी में पैदा हुईं, बिलग्राम में ब्याहीं और मुस्तफ़ाबाद या लखनऊ मेरे माता-पिता से मिलने आती रहीं. फिर बँटवारा हुआ, उसके बाद ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा और फिर उनके शौहर का इंतकाल जो एक छोटे-मोटे  सामंत थे. बाराबंकी और बिलग्राम के घर जीण-शीर्ण हालात में थे. नानी अम्मी हमारे साथ रहने आ गईं और मुस्तफ़ाबाद और लखनऊ के बीच आना-जाना करती रहीं.

पासपोर्ट की ज़रूरत इसलिए आन पड़ी थी कि उनकी दो बेटियाँ पाकिस्तान में ब्याहीं और वहीं रह गईं. उनकी कश्मकश उतनी ही शदीद थी जितनी टोबा टेक सिंह की (सआदत हसन मंटो का एक काल्पनिक चरित्र) जो यह नहीं  समझ पाया कि बँटवारा होने पर उसका गाँव पाकिस्तान में कैसे ‘जा’ सकता है; उसी तरह नानी अम्मी नहीं समझ पाईं कि उनकी बेटियाँ दूसरे मुल्क कैसे ‘जा’ सकती हैं. कोई अपना घरबार हमेशा के लिए कैसे छोड़ सकता है? उन्हें दिलासा देने की कोशिश में यह बतलाया गया कि उनकी बेटियाँ, सुग़रा  और सकीना, वाकई घर छोड़ कर नहीं जा रही हैं. बम्बई में उनकी लड़कियों के वास्ते दो ‘बहुत अच्छे लड़के’ थे, मगर लाहौर लखनऊ से बेहद करीब था. तिस पर वे ‘लड़के’ (जिन्हें पाकिस्तान के कुछ कज़िन ने ढूँढा था) बहुत अच्छी ‘ज़ात’ के थे. ( उपमहाद्वीप के मुसलमानों पर हिन्दू जाति प्रथा के असर को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सैयद, शेख़, पठान अब भी ऊँची जातियाँ हैं और जुलाहे और दीगर पेशेगत श्रेणियों को नीचा माना जाता है.)
    
हिंदुस्तान का नक्शा निकाल कर बिछाया गया. नानी अम्मी को दिखाया गया कि कैसे त्रिवेंद्रम, मद्रास, बैंगलोर, हैदराबाद, बम्बई ये सब हिंदुस्तान में होते हुए भी लखनऊ से लाहौर क्या कराची से भी ज़्यादा दूर थे. उन्हें बतलाया गया की हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सरहद महज एक बनावटी सरहद थी जिसे चंद हफ़्तों में एक ‘अंग्रेज़’ सर सिरिल रैडक्लिफ ने जल्दी-जल्दी में खींच दिया था, जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच की सरहद का फैसला करने के लिए मुकर्रर लिए गए दो कमीशनों के मुखिया थे. वक़्त के साथ-साथ सरहद ख़त्म हो जाएगी और वह  उसे एक अस्थायी असुविधा के तौर पर ही  लें.

इसलिए नानी अम्मी सुग़रा और सकीना को पाकिस्तान के ‘लड़कों’ से ब्याहने को राज़ी हो गईं. मगर जल्दी ही वह  उनके शुरूआती शुबहों से रूबरू हुईं जो शुरुआत थी मोहभंग की. उनकी हसरत थी कि वह अपनी बेटियों के पास लाहौर जाएं और उन्हें पासपोर्ट हासिल करने को कहा गया. अगर लाहौर और कराची हिंदुस्तान के दीगर बड़े शहरों के मुकाबले लखनऊ से नज़दीक थे तो फिर क्यों उन्हें रेलगाड़ी के टिकट के अलावा एक और ‘टिकट’ लेने के लिए क्यों कहा जा रहा है. इस ‘अजीब’ ज़रूरत के पीछे की वजहों को उन्हें समझाने की कोशिशें की गईं, फिर पासपोर्ट के फॉर्म लाए गए और उन्होंने अचरज के साथ अपनी साफ़ उर्दू लिखावट में उन्हें भरा. मोहभंग  का दूसरा मौक़ा आया. मेरे पिता के मुंशी ने उन्हें बतलाया कि अगर फॉर्म हिंदी या अंग्रेज़ी में भरा जाए तो उन्हें पासपोर्ट जल्दी मिल जाएगा. क्या उर्दू का कोई मोल नहीं रहा? उन्होंने पूछा.

नानी अम्मी का उर्दू से लगाव इस वजह था क्योंकि यही इकलौती लिपि उन्हें सिखाई गई थी, हालांकि जो भाषा वह बोलती थीं वह थी खालिस अवधी या देहाती. दरअसल, बोली के मामले में लिंगभेद था. ज़्यादातर ख़वातीन अवधी या देहाती बोलतीं  मगर औपचारिक मौकों पर उर्दू या हिंदुस्तानी बोल लेतीं. हज़रात उर्दू या हिंदुस्तानी में गुफ़्तगू  करते और अनौपचारिक मौकों पर अवधी या देहाती पर आ जाते.

पासपोर्ट, जो नानी अम्मी के लिए हमेशा एक बेहद नापसंद दस्तावेज़ रहा, के बिना ही वह सिधार गईं इस बात में कुछ प्रतीकात्मकता शायद होगी. वह  लाहौर में अपनी बेटियों के पास थीं, छह महीनों से बीमार. उनका  हिंदुस्तानी पासपोर्ट एक्सपायर हो चूका था. वह चाहती थीं कि उसे रिन्यू करवाया जाए क्योंकि वह चाहती थीं कि उन्हें मुस्तफ़ाबाद में दफ़नाया जाए. उनकी बेटियों ने उनसे कहा कि यह काम जल्दी ही करवाया जाएगा. मगर बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया. वह एक बेहद ग़मगीन  दौर के रूप में मेरी यादों में बसा है. नानी अम्मी के इंतिकाल से हम उबरे ही थे  कि अखबारों ने  मुरादाबाद (उ.प्र) में 1980 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बारे में दुनिया को बताया, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हमेशा की तरह ‘हज़ारों’ बेघर हुए.

Wednesday, September 28, 2016

सुधीश पचौरी और संपादक की बीमार मानसिकता का विरोध

फोटो 5 अक्तूबर 2013 के उसी कार्यक्रम का है जिसे सुधीश पचौरी बर्दाश्त नहीं कर सका था। 

हमारे प्यारे कवि वीरेन डंगवाल की बीमारी को लेकर 6 अक्तूबर 2013 को `दैनिक हिंदुस्तान` में सुधीश पचौरी की घिनौनी टिप्पणी प्रकाशित हुई थी तो पचौरी और अख़बार के संपादक की चारों तरफ निंदा हुई थी। मेल बॉक्स की सफाई करते हुए यह मेल भी सामने आया जो उस बीमार मानसिकता के विरोध में HT Media ltd की Chairperson शोभना भरतिया को भेजा गया था।


श्रीमती शोभना भरतिया
अध्यक्षा
एच. टी. मीडिया लि.
हिंदुस्तान टाइम्स भवन
नई दिल्ली


प्रिय महोदया,
हम आपका ध्यान आपके संस्थान द्वारा प्रकाशित हिंदी के लोकप्रिय दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को प्रकाशित एक व्यंग्य की ओर दिलाना चाहते हैं। यह व्यंग्य एक ऐसे व्यक्ति पर है जो कि कैंसर से पीड़ित है। हद यह है कि व्यंग्य उस व्यक्ति के बीमार होने पर है।  इसके लेखक हैं सुधीश पचौरी। इस बीच पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में इस की भर्त्सना करते हुए टिप्पणी भी प्रकाशित हुई है। (कृ. देखें संलग्न टिप्पणी)

हिंदी के जिस जानेमाने कवि का मजाक उड़ाया गया है, उस अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि का नाम है, वीरेंद्र डंगवाल। इस के बावजूद कि कवि के संदर्भ को शब्दों के चातुर्य से ढका हुआ है पर सारा हिंदी जगत जानता है कि किस की मजाक उड़ाई गई है। इस लेख के पीछे छिपी अमानुषिकता और निर्ममता का कोई सानी नहीं है। दुनिया के किसी भी समाचारपत्र में साहित्य या व्यंग्य के नाम पर शायद ही कहीं ऐसा देखने को मिलता हो। सच यह है कि कोई भी सभ्य समाज इस तरह की बेहूदगी और बर्बरता नहीं दिखला सकता जैसी कि आपके अखबार के माध्यम से सामने आई है। हम आपसे अपेक्षा करते हैं कि आप इस को एक बार देखें और विचार करें कि क्या इस तरह की हरकत किसी अखबार को शोभा देती है?

हमें आशा थी कि अखबार के संपादक मामले की गंभीरता को देखते हुए इस बीच इस पर जरूर कार्रवाई करेंगे। पर अफसोस की बात यह है कि दो माह से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद संपादक ने कुछ नहीं किया बल्कि वह यह उम्मीद किए बैठा लगता है कि लोग इस आमानुषिकता को भूल जाएंगे। इससे जाहिर होता है कि इस व्यंग्य के छापने में आपके संपादक का पूरा-पूरा हाथ है।

आप इस मामले में क्या कार्रवाई करती हैं और क्या नहीं, यह आपका सरोकार है पर हिंदी से जुड़ा होने और हिंदी समाज का हिस्सा होने के नाते हमें आपका ध्यान इस ओर दिलाना जरूरी लगा है। हम इस तरह के कृत्य से अपनी असहमति और विरोध अभिव्यक्त करते हैं।
सधन्यवाद
भवदीय

1. आनंद स्वरूप वर्मा

2. असद जै़दी

3. रामशरण जोशी

4. पंकज बिष्ट

5. अजय सिंह

6. प्रकाश चौधरी

7. अशोक पाण्डे

8. शिरीष मौर्य

9. धीरेश सैनी



To
Smt. Shobhana Bhartia
The Chairperson
H T Media Ltd.
New Delhi

Dear Madam
We the following Hindi Writers would like to draw your attention to an item published by your well known Hindi daily Hindustan on 6th Oct. 2013. This so called humer or satir is on a man suffering from the dreded desease of Cancer. This 'pice of humer' is written by a man called Sudheesh Pachauri.

For your information a number of Hindi magaziesns and social media sites have taken note of it and commented on this dasderdly act. (Pl see the encolsed clipping).

This sort of inhumanity and heartlessness in the name of freedom of the press is unthinkable and unheard of. It is neither literature nor journalism. The fact is that no civilised society can allow this sort of indecency and barbarianism. The name of the poet who has been reduculed in this piece is Virendre Dangwal, a recipent of Sahitya Academi award. We request you to just have a look at it and decide of your own whether this is justified by any yardstick? Through this letter we would also like to express our displeasure as well as our opposition to this sort of writing.

with best wishes

1. A. S. Verma
2. Asad Zaidi
3. R. S. Joshi
4. Pankaj Bisht
5. Ajay Singh
6. Dheeresh Saini
7. Prakash Chaudhri
8. Shirish Morya
9. Ashok Panday




शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता
पहले यह टिप्पणी देख लीजिए:
''एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले वह उन थोड़े से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई। फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाज पुरसी की ओर गई। थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी शरारत अब भी वैसी ही है। (क्या गजब 'फेस रीडिंग` है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर) हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों से सुना, तो लगा कि यार ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं तो क्या वे बुजुर्ग चमचे आप के डाक्टर हैं जो दवा दे रहे हैं। लेकिन 'चमचई` में ऐसे सवाल पूछना मना है।`` यह टुकड़ा 'ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!` शीर्षक व्यंग्य का हिस्सा है जो दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को छपा था। इस व्यंग्य की विशेषता यह है कि यह एक ऐसे व्यक्ति को निशाना बनाता है जो एक दुर्दांत बीमारी से लड़ रहा है। हिंदी के अधिकांश लोग जानते हैं कि वह कौन व्यक्ति है। दुनिया में शायद ही कोई लेखक हो जो बीमार पर व्यंग्य करने की इस तरह की निर्ममता, रुग्ण मानसिकता और कमीनापन दिखाने की हिम्मत कर सकता हो।
पर यह कुकर्म सुधीश पचौरी ने किया है जिसे अखबार 'हिंदी साहित्यकार` बतलाता है। हिंदीवाले जानते हैं यह व्यक्ति खुरचनिया व्यंग्यकार है जिसकी कॉलमिस्टी संबंधों और चाटुकारिता के बल पर चलती है।
इस व्यंग्य में उस गोष्ठी का संदर्भ है जो साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित सबसे महत्त्वपूर्ण समकालीन जन कवि वीरेन डंगवाल को लेकर दिल्ली में अगस्त में हुई थी। वह निजी व्यवहार के कारण भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि कवि के रूप में। वीरेन उन साहसी लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी बीमारी के बारे में छिपाया नहीं है। वह कैंसर से पीडि़त हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। पिछले ही माह उनका आपरेशन भी हुआ है।
हम व्यंग्य के नाम पर इस तरह की अमानवीयता की भर्त्सना करते हैं और हिंदी समाज से भी अपील करते हैं कि इस व्यक्ति की, जो आजीवन अध्यापक रहा है,  निंदा करने से चूके। यह सोचकर भी हमारी आत्मा कांपती है कि यह अपने छात्रों को क्या पढ़ाता होगा। हम उस अखबार यानी हिंदुस्तान और उसके संपादक की भी निंदा करते हैं जिसने यह व्यंग्य बिना सोचे-समझे छपने दिया। हम मांग करते हैं कि अखबार इस घटियापन के लिए तत्काल माफी मांगे और इस स्तंभ को बंद करे।
- समयांतर, नवंबर 2013 में छपी टिप्पणी
(पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लेखकों के फोन नंबर भी दिए गए थे जो यहां पोस्ट में हटा दिए गए हैं।)